अक्सर जिस घर में नहीं होते है लोग वहाँ लग जाती है धूल , जैसे अस्तित्व ही नहीं अब वहाँ लोगों का
घर के बंद कमरे को देखकर ही मालूम चल जाता है ∣ कि इसका निवासी छोड़ गया इसे अब नहीं है कोई रखवाला इस आशियाने का ∣
कहने की बातें होती है कि जिससे ज्यादा लगाव हो उसे भूलाया नहीं जाता ,अक्सर इतनी जल्दी लोग भूल जाते हैं किसी चीज को जैसे अपना कभी था ही नहीं वो ∣
जिस तरह एक आलीशान घर में रहने के बावजूद उसकी खिड़कियों में जाले और घर के गेटों पर धूल जम जाती है ∣ ध्यान नहीं देने पर वैसे ही जिंदगी का संस्मरण धूल की गिरफ्ता में हो जाया करता है, नजर अंदाज करने पर ∣
धूल और जाले अक्सर बता जाते हैं, किसी घर की हालात को कि कितना ध्यान दिया जाता है उस घर में ∣
भले वो बड़ा हो या छोटा बनता वो जब ही वो घर -घर है ∣
जहाँ उसे कोई अपने प्रेम से सीचता द्वारपाल बनकर उस घर के आंगन लगे फूलों को जिसकी खूबसूरती बयां कर जाती किसी घर के सुख चैन को ∣
जिंदगी में अक्सर हम इतने आगे निकल जाते हैं ∣ कि कहने को तो बहुत लोग होते हैं, हमारे जान पहचान के पर अपना कहने वाले लोगों की केवल हमारे पास धूल भरी स्मृति होती हैं ∣
जिसे कभी साफ करने का वक्त ही नहीं दिया होता हमने ∣


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