कबीर


"शब्द सम्हारे बोलिए शब्द के न होत  हाथ  पावं एक शब्द औषधि का काम करे तो एक शब्द करे घाव"

जिसका अर्थ इस तरह से  है

कि शब्द को उपयोग बहुत सोच समझ करना चाहिए एक शब्द व्यक्ति के लिए दवा का काम करता है तो एक शब्द ऐसा घाव करता है जिसे कभी भरा नहीं जा सकता.

हिन्दी साहित्य 

भक्तिकाल को  धारा में बांटा गया था जिसमें निर्गुण और सगुण धारा थी

निगु॔ण धारा में वो लोग जो मूर्ति पूजा का विरोध करते थे निराकार बाह्यम की उपासना करते  थे 

इसमें दो शाखाएँ थी- जिसमें

1.ज्ञानमार्गी शाखा

*जिसके प्रतिनिधि कवि ' कबीर दास' थे

२.प्रेममार्गी शाखा

जिसके प्रतिनिधि कवि मालिक मोहम्मद जायसी है जिनकी रचना पदूमावत  है.

"कबीर की लेखनी से एक लेखक बहुत कुछ सीख सकता है जैसे अपनी बातों में सत्य को ऐसे रखना जो किसी को बुरी भी न लगे और बात कह दी जाए".

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