आज विश्व पृथ्वी दिवस है मुमकिन है कि पहले की तरह ही सब कुछ ठीक हो जाऐगा हमने पृथ्वी को जितने भी कष्ट दिऐ है उन सब की अब भरपाई हो जाऐगी क्यों कि अब लॉक डाउन की समयावधि में लोगों के काम करने के तरीके बहुत बदल गए हैं.
जिसके परिणामस्वरूप अब एक फिर प्रकृति को अपने अनुसार जीवन जीने का मौका मिला है चारों तरफ पशु पक्षी सुख शांति से अपना जीवन बसेरा कर रहे हैं .
कोयल कूहु कूहु करती है तो मोर नाचने लगे.
नदी का पानी पहले की तुलना में साफ हो गया है
प्रदूषण की मात्रा पहले से कम हो गयी है वातावरण स्वच्छ हो गया है एक बार फिर मौसम अपना जादू दिखाने लगा है नहीं तो पहले हम सब की हालात बिल्कुल-
" मेरे नैना सावन भादों
फिर भी मेरा मन प्यासा"
की तरह थी मौसम तो होता था अच्छा लेकिन कभी उसके लिए सोचने का वक्त ही नहीं मिला.
अगर आज से भी हम गिनना शुरू करे कि आधुनिकता के कारण हमारी पृथ्वी कितनी चोटे खा रही तो शायद समय कम पड़ जाएगा.
आज के समय मनुष्य की प्रवृत्ति बहुत लालची किस्म की हो गयी है जिसमें वो केवल अपना स्वार्थ देखता है जिसकी देन हमें प्रदूषण, दूषित पानी, ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या उत्पन्न होती है.
लॉक
डाउन की वजह से लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो गया है वहीं दूसरी तरफ प्रकृति को कुछ दिन का सुकून मिला है जिस कारण वो अपनी जिंदगी निर्भीक हो कर जी रहे है
आज फिर एक बार हम सब को
"धरती मेरी में माता
पिता आसमां
तुझ को तो अपना लगे
पिता आसमां
तुझ को तो अपना लगे
सारा जहाँ,
सुनने की आवश्यकता बन पड़ी है.
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